المرءُ في بيته.. تحفُّ به وجوهُ أحبّته وفي القبور.. جميعُنا محفوفون بالغيابِ والترابِ. أيا ترابُ.. هل عفّرتَ وجوهاً كريمةً.. نُحبّها ونشتاقها، أيا ترابُ.. هل كتمتَ أنفاسهم وهي بذكرِ الله تشهَقُ وتزفِرُ، أيا ترابُ.. هل ابتلعت أحشاؤكَ أصواتَهم.. وأسماءَنا التي نادَونا بها. أيُّها الترابُ.. غداً.. هل ستلتهمُ حكاياتي والكلمات، وتذوي إجاباتي.. لماذا لم أغمُضْ بعد؟! وتَغمُضُ عينٌ.. ويهوي الفكُّ، بمِجرفةٍ وحُرقةِ قلبٍ.. تن.. تنه.. ثم تنهااااال.